इतनी बातें दिमाग में
फालतू और काम की
इन तमाम बातों में
खो गयी है ज़िन्दगी
जी रहा हूँ एक दिन
जी रहा हूँ एक रात
एक दिन और एक रात में
कट रही है ज़िन्दगी
कारवा और महफिले
हैं और रहेंगे मेरे बाद भी
एक बार एक बार
एक बार मेरी ज़िन्दगी
रेत भरी मुठ्ठी है
कस रहा हूँ जोर से
जीने की तीव्र चाह में
मर रही है ज़िन्दगी
बहुत अच्छी रचना है !
ReplyDeleteपंक्तियाँ दिल को छूती हैं :
रेत भरी मुठ्ठी है
कस रहा हूँ जोर से
जीने की तीव्र चाह में
मर रही है ज़िन्दगी
आज की आवाज
मर के भी न मरे जिन्दगी गर जीने की चाह।
ReplyDeleteदिल में हो जज्बात अगर तो खुद निकलेंगे राह।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.
Badhiya rachana...blog jagat men svagat ke sath meree shubhakamnayen.
ReplyDeleteHemantKumar
जी रहा हूँ एक दिन
ReplyDeleteजी रहा हूँ एक रात
एक दिन और एक रात में
कट रही है ज़िन्दगी
रब ने लिख दी जितनी सांसे उतनी तो लेनी ही होगी ,
दिन गिनो या जियो,क्या जीना मरना ही है ज़िन्दगी .. मक्
आपका स्वागत है मित्र ..
बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्लाग जगत में स्वागत है…मेरे ब्लोग पर आपका स्वागत है।आपके भाव दिल में उतर गए। बहुत अच्छा लिखा है बधाई।
ReplyDeleteहिंदी भाषा को इन्टरनेट जगत मे लोकप्रिय करने के लिए आपका साधुवाद |
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