Monday, July 13, 2009

मर रही है ज़िन्दगी

इतनी बातें दिमाग में
फालतू और काम की
इन तमाम बातों में
खो गयी है ज़िन्दगी

जी रहा हूँ एक दिन
जी रहा हूँ एक रात
एक दिन और एक रात में
कट रही है ज़िन्दगी

कारवा और महफिले
हैं और रहेंगे मेरे बाद भी
एक बार एक बार
एक बार मेरी ज़िन्दगी

रेत भरी मुठ्ठी है
कस रहा हूँ जोर से
जीने की तीव्र चाह में
मर रही है ज़िन्दगी

6 comments:

  1. बहुत अच्छी रचना है !

    पंक्तियाँ दिल को छूती हैं :

    रेत भरी मुठ्ठी है
    कस रहा हूँ जोर से
    जीने की तीव्र चाह में
    मर रही है ज़िन्दगी


    आज की आवाज

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  2. मर के भी न मरे जिन्दगी गर जीने की चाह।
    दिल में हो जज्बात अगर तो खुद निकलेंगे राह।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.

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  3. Badhiya rachana...blog jagat men svagat ke sath meree shubhakamnayen.
    HemantKumar

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  4. जी रहा हूँ एक दिन
    जी रहा हूँ एक रात
    एक दिन और एक रात में
    कट रही है ज़िन्दगी
    रब ने लिख दी जितनी सांसे उतनी तो लेनी ही होगी ,
    दिन गिनो या जियो,क्या जीना मरना ही है ज़िन्दगी .. मक्
    आपका स्वागत है मित्र ..

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  5. बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…मेरे ब्लोग पर आपका स्वागत है।आपके भाव दिल में उतर गए। बहुत अच्छा लिखा है बधाई।

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  6. हिंदी भाषा को इन्टरनेट जगत मे लोकप्रिय करने के लिए आपका साधुवाद |

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